12वीं पास 38 साल के बागबान अनिल कुमार बिस्वान जब अपने सेब के बगीचे में गाैमूत्र, जीवामृत, घनजीवामृत जैसे प्राकृतिक तरीके से छिड़काव करते थे लाेग उन्हें अनुभवहीन बागबान कहते थे। जबकि अब वे अपने बगीचे में एक साल में महज पांच हजार रुपए के खर्च पर करीब आठ लाख रुपए की कमाई कर रहे हैं। इनकी अब 1200 के करीब सेब की पेटियां हाेती हैं। दूरदराज क्षेत्र चिड़गांव विकास खंड के खाबल गांव से संबंध रखने वाले बागबान अनिल कुमार बिस्वान ने क्षेत्र में सफल प्राकृतिक खेती बागबान के रूप में अपनी पहचान बनाई है।
2018 से प्राकृतिक खेती की शुरुआत करने वाले अनिल की कहानी काफी दिलचस्प है। अनिल ने बताया कि पहले वह भी आस-पास के बागबानों की तरह रासायनिक विधि से ही फलोत्पादन कर रहे थे। एक ओर जहां बागबानी में बढ़ रहे कीट-खरपतवार-फफूंदनाशकों के प्रयोग से उनकी आर्थिकी पर विपरीत असर पड़ रहा था। वहीं, इन रसायनों के प्रयोग के बाद भी उन्हें फलोत्पादन में कोई बढ़ोतरी देखने को नहीं मिल रही थी।
लागत कम करने और फलोत्पादन बढ़ाने का तरीका वह इंटरनेट पर खोज रहे थे। तभी उन्हें प्राकृतिक खेती के बारे में पता चला। खेती-बागबानी के इस तरीके के बारे में और जानकारी के लिए उन्होंने यूट्यूब वीडियोज का सहारा लिया और आश्वस्त होने के बाद इसी खेती पद्धति को अपनाने का निश्चय कर लिया। वह तुरंत ही देसी गाय ले आए और इंटरनेट पर मौजूद वीडियो देखकर आदान (दवाई) बनाने लगे।
वर्ष 2018 में उन्हें प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के बारे में पता चला और कृषि अधिकारियों से बातचीत के दौरान महसूस हुआ कि यह वही खेती पद्धति है जिसके बारे में वह इंटरनेट पर देख रहे थे तो उन्होंने तुरंत इसका प्रशिक्षण लेने के लिए हामी भर दी। इसके बाद उन्होंने नौणी विश्वविद्यालय में प्राकृतिक खेती पर आयोजित तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा लिया।
वहां पर मिली व्यावहारिक जानकारी से उन्हें आदानों में घटकों की मात्रा के बारे में स्पष्टता हुई। अनिल ने बताया कि रासायनिक खेती के दौरान उनका वार्षिक खर्च 70 हजार रुपए के आसपास आता था जो अब घटकर 10 हजार रह गया है। सुभाष पालेकर विधि अपनाने के बाद खादों व कीटनाशकों पर कोई खर्च नहीं हो रहा।
रायल डिलिशियस, रेड गोल्ड और स्पर उगा रहे : अनिल का 20 बीघा का बागीचा हैं। जिसमें लगभग 400 सेब के पौधे हैं। उन्होंने सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती विधि से रायल डिलिशियस, रेड गोल्ड और स्पर किस्म के सेब की पैदावार की है। बाकी मटर, राजमाह, कोदा और चुलई जैसी फसलें भी उन्होंने अपने बगीचे में उगाई हैं। अनिल ने बताया कि प्राकृतिक खेती में पौधे की वृद्धि आश्चर्यजनक है। सेब के फलों पर चमक और रंग भी रासायनिक की तुलना में काफी बेहतर है।
कृषि विभाग ने बनाया मास्टर ट्रेनर : अनिल बिस्वान ने कुफरी में सुभाष पालेकर जी से भी छह दिवसीय प्रशिक्षण लिया है। जिसके बाद कृषि विभाग ने अनिल को मास्टर ट्रेनर बनाया है। वह अपने आस-पास के क्षेत्रों में प्राकृतिक खेती विधि का प्रचार और प्रसार कर रहे हैं। अभी तक उन्होंने विभिन्न प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से 200 किसान-बागबानों को इस विधि से जोड़ा है। वह कहते हैं कि अगर किसान-बागवान को खेती लागत में कमी के साथ फसल की बीमारियों से रक्षा करनी है तो यही विधि सबसे उत्तम है।
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Source From
RACHNA SAROVAR
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