महागठबंधन के घटक दलों में रुठने-मनाने का लंबा सिलसिला चला। वजह एक रही है, सीट शेयरिंग में सभी एक-दूसरे से ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी चाहते थे। अब सबने सीटों की संख्या बांट ली है। अलग-अलग लड़ने से सबको घाटा होगा। गठबंधन से हम और रालोसपा पहले ही अलग हो चुके हैं। अब वीआईपी ने भी अलग राह पकड़ ली है।
इनके जाने से गठबंधन पर होने वाले सीधे असर को आंकना इसलिए थोड़ा पेचीदा है कि इन दलों की वोट हैसियत अभी ठीक से किसी भी चुनाव में सीधे सामने नहीं आई है। तीनों पार्टियों के नेता जातीय आधार को ही ताकत मानते हैं, लेकिन कभी अकेले लड़े नहीं। गठबंधन में जब भी लड़े वोट शेयर 2-3% से कम ही रहा।
इसके ठीक उलट राजद, कांग्रेस, भाकपा, माकपा और माले का वोट सार्वजनिक है। ये पार्टियां अकेले भी और गठबंधन में भी। ये जब-जब अकेले लड़ीं तो इनका वोट शेयर भले थोड़ा बहुत बढ़ा लेकिन सीटें सिमट गईं। 2010 चुनाव के नतीजे सामने हैं। तब 243 सीटों पर कांग्रेस के प्रत्याशी थे, लेकिन पार्टी 4 सीट बहादुरगंज, किशनगंज, कसबा और कहलगांव ही जीत पाई।
कांग्रेस 17 विधानसभा क्षेत्रों में दूसरे स्थान पर थी लेकिन एनडीए उम्मीदवारों के मुकाबले गैप काफी बड़ा था। 2000 में 23 और 2005 में 5 सीट ही कांग्रेस को हासिल हुईं थीं। लेकिन 2015 के चुनाव में कांग्रेस के स्ट्राइक रेट में गजब का उछाल आया। पार्टी 40 सीटें लड़ी और 27 जीत गई। तब वह राजद-जदयू के साथ थी। पार्टियों को पता है कि एनडीए की ताकत के सामने अकेले जोरआजमाइश मायने नहीं रखती। साथ आना, साथ लड़ना मजबूरी है।
2010 में कांग्रेस 17 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही
रामनगर, नरकटियागंज, रीगा, निर्मली, अमौर, बायसी, धमदाहा, पूर्णिया, कोढ़ा, आलमनगर, सिमरी बख्तियारपुर, मटिहानी, भागलपुर, शेखपुरा,बरबीघा, पटना साहिब और वजीरगंज
जब-जब तीनों साथ रहे, एक दूसरे को अपना वोट कराया ट्रांसफर
भाकपा-माले 1990 (तब आईपीएफ) के बाद लगातार अकेले लड़ती रही और 3-6 सीटें जीतती रही। 2010 का चुनाव अपवाद था जब पार्टी खाता भी नहीं खोल सकी। महागठबंधन के घटक दलों के लिए 2020 की चुनावी पिच 2010 जैसी है क्योंकि एनडीए का आज का स्वरूप थोड़ा-बहुत ऊंच-नीच के साथ 2010 जैसा ही है।
महागठबंधन के घटक की तीनों प्रमुख पार्टियां राजद, भाकपा-माले और कांग्रेस...2010 की ही तरह अलग-अलग लड़तीं तो खामियाजा तीनों को भुगतना पड़ता। जब-जब तीनों साथ रहीं और एक-दूसरे को अपना वोट ट्रांसफर करा ले गईं तो एनडीए को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में रहीं। गठजोड़ से ही इनकी ताकत बढ़ेगी क्योंकि 2010 के बाद हुए चुनावों में कुछ भी ऐसा संकेत नहीं है जिससे साबित हो कि इन दलों का समर्थन आधार बढ़ रहा है।
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Source From
RACHNA SAROVAR
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