बिहार की राजनीति में गठबंधन का असर अलग-अलग सीटों पर अलग-अलग पड़ता है। न सिर्फ जीत हार में बल्कि वोटिंग और विनिंग पैटर्न में भी इस असर साफ झलकता है। फर्स्ट फेज में जिन सीटों पर 28 अक्टूबर को वोटिंग होनी है, उन सीटों के वोटिंग पैटर्न और जीत के अंतर पर नजर डालें तो फर्क साफ दिखता है।
2010 में जब जदयू और भाजपा गठबंधन के रूप में चुनाव मैदान में थे। तब चकाई, भभुआ, गोह, ओबरा, बड़हरा ऐसी सीटें थीं जहां जीत अंतर क्रमश: सबसे कम रहा। वहीं, 2015 में इन सीटों पर जीत का अंतर बढ़ गया। 2015 में इनमें से तीन सीटें राजद और दो सीटें बीजेपी ने जीती। वहीं तरारी, चैनपुर, आरा, दिनारा और मुंगेर में जीत का अंतर सबसे कम रहा।
इन सीटों पर विनर और रनर प्रत्याशी के बीच 250 वोटों से भी कम अंतर का रहा। वहीं जब इन सीटों पर भाजपा और जदयू एक साथ लड़े थे तो जीत का अंतर क्रमश: 14000 मतों से अधिक का रहा था। 2015 में इन पांच में से दो सीटों पर जदयू-राजद का गठबंधन जीता था और एक-एक पर भाजपा और सीपीआईएमएल को जीत मिली थी। 2010 में ये सभी सीटें भाजपा गठबंधन बड़े अंतर से जीता था।
2010 में बड़े अंतर से जीते, 2015 में घट गया
2010 व 2015 में बड़े अंतर से जीत वाली सीटों में बिक्रम, बेलागंज, मसौढ़ी, मखदुमपुर, जहानाबाद ऐसी सीटें थी जहां अंतर 2015 में जब राजद और जदयू साथ चुनाव लड़ रहे थे तो सबसे ज्यादा था। 2010 में लखीसराय, गया टाउन, गोविंदपुर, बाराचट्टी और जमुई में अंतर सर्वाधिक था। बिक्रम, बेलागंज, मसौढ़ी, मखदुमपुर व जहानाबाद में 2010 में जब जदयू महागठबंधन में नहीं था तो जीत का अंतर कम था।
ऐसा ही फर्क लखीसराय, गया टाउन, गोविंदपुर, बाराचट्टी व जमुई सीटों पर दिखा। इन सीटों पर 2010 में प्रत्याशी बड़े अंतर से जीते थे वहीं 2015 में जब जदयू महागठबंधन में गया तो जीत का अंतर घट गया। 2010 में ये सभी सीटें एनडीए के पास थीं, 2015 में तीन सीटें महागठबंधन जीत गई और दो पर भाजपा जीती।
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Source From
RACHNA SAROVAR
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