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बिहार में का बा: परिवर्तन की सुगबुगाहट है पर कुछौ नहीं होगा की आहट है

खला। ख़ालीपन। रिक्तता। कोई मेला नहीं, कोई रैला नहीं, रैली तो छोड़िए गांधी मैदान में इ-संवाद हो रहा है, सोशल मीडिया पर उ विवाद। इ चुनाव रिक्तता का चुनाव है। ख़ालीपन में, ख़ालीपन से, ख़ालीपन का चुनाव। परिवर्तन की सुगबुगाहट है पर कुछौ नहीं होगा की आहट है। किसी का फ़ेस, किसी का फ़ेसबुक, किसी की रेलगाड़ी छुक छुक।

गठबंधन की गाँठ सुलझाई जा रही है, नई बिसात बिछाई जा रही है पर कुछ भी सामान्य नहीं है। विश्वप्रसिद्ध बिहारी चुनाव जैसा सामान्य, कुछ भी नहीं। वैश्विक महामारी और संक्रमण का ख़तरा, चेहरे पर मास्क, सैनिटाइज़र उड़ेल कर जब उँगली पर लोकतंत्र के बचे निशान की निशानी लगेगी तो ढाक पर कोंपलें फिर निकलेंगी तीन। तीन पात। बात पर बात। पक्ष, विपक्ष और इन पाटन के बीच एक बिहारी, लय भारी। माहौल ही नहीं है। ग़ज़बे माहौल है।
हेमा मालिनी के गाल का सपना दिखाने वाले नेपथ्य में हैं। जो मंच पर आसीन हैं, उदासीन हैं। सड़कें बनी तो बिहार में बहार को रफ़्तार मिली पर उन सड़कों पर चाँद उतर आया है। अपने साथ गड्ढे लाया है। चाँदनी रातों में सैकड़ों चाँद सड़क पर ठहरे पानी से छिटककर किसी को नहीं चुभ रहीं।

अकारण नहीं है ऐसा। परिवर्तन की पुकार। इतनी बार। कि भेड़िया आया भेड़िया आया चिल्लाने वाले बच्चे की कहानी याद आ जाए। नानी याद आ जाए। एक जंगल राज है तेरी आँखों में, मैं जहां राह भूल जाता हूँ। गनतंत्र की पकड़ थोड़ी ढीली पड़ी थी तो निवेश और वृद्धिदर बज़ वर्ड्स बन गए थे, अब फिर से बज रहे हैं तड़ तड़, कट्टे। लाठी, भैंस। बाहुबली, चट्टे बट्टे। काहे का चुनाव? कैसे करें? ख़ालीपन को ख़ालीपन से कैसे भरें? कौन सुपात्र है, कौन कुपात्र है? कौन मुखौटा मात्र है?
सुनिए सबकी, चुनिए अपने मन की। ये तो सुना है। पर इस बार ट्वंटी ट्वंटी है सो एक और ख़तरे की घंटी है। ये पहला पूर्णतया सोशल मीडिया का चुनाव है। दुनिया भर में बहस जारी है कि सोशल मीडिया मस्तिष्क में सेंधमारी है। व्हाट्सएप, फ़ेसबुक और ट्विटर पर हमारे मस्तिष्क की सेल लगी है, पार्टियाँ बोली लगा रही हैं।

पात्रता और रिक्तता का अनोखा गठबंधन है

पात्रता और रिक्तता का अनोखा गठबंधन है। पात्र होने के लिए रिक्त होना आवश्यक है। घड़ा भरा हो तो बेकार है। घड़े का ख़ाली होना दरकार है। यहाँ सब भरे हैं। बल है, दंभ है, अहंकार है। एक तरफ़ भरा-भरा विपक्ष है, दूजी ओर भरी पूरी सरकार है। भर भरा मंच है, प्रपंच है, प्रचार है। मुद्दा अब भी भ्रष्टाचार है। तो इस बार क्या विचार है?

संक्रमण पर विजय के पहले, महामारी से युद्ध के बीचोंबीच आया एक त्योहार है तो इस की मर्यादा रहनी चाहिए। डबल इंजिन की शाब्दिक रेल चलने दीजिए, जंगल-मंगल, सुशासन-अनुशासन का तेल मलिए, बूथ पर चलिए। इलाज करवाइए अपने घुटने की तकलीफ़ का। घुटते मत रहिए।

देश के किसी राज्य को सुरखाब के पर नहीं लगे। बिहार के माथे पर पिछड़ेपन का ठप्पा लगा है। चुनाव आयोग का अंगुली पर टीका मिट जाता है, ये ठप्पा मिटता नहीं। और अगर चुनाव का अर्थ इस दाग़ को मिटाने का प्रयास नहीं तो फिर काहे का चुनाव!



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कमलेश सिंह, वरिष्ठ पत्रकार और बिहार मामलों के जानकार।


Source From
RACHNA SAROVAR
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