राजनीति यदि शतरंज है तो बिहार को उसमें राजा का दर्जा मिलना चाहिए और जब बिहार की राजनीति में शतरंज की खतरनाक चालें चली जाने लगें तो समझ लीजिए कि चुनाव का मौसम आ चुका है। पांच साल बाद ये मुंह दिखाई का समय होता है और नेताओं के लिए पांच वर्षों में गंभीर मुद्दों पर मौन व्रत तोड़ने का यही मुहूुर्त होता है।
कहा जाता है कि कलियुग में किसी भी इंसान को दूसरे उम्मीद नहीं करनी चाहिए। लेकिन चुनाव का समय एक ऐसा समय होता है जब हर कोई किसी ना किसी से उम्मीद लगाए होता है। सबसे पहले तो नेता जनता से उम्मीद लगाए रहती है कि इस बार जनता उन पर जरूर मेहरबान होगी और उन्हें सत्ता के गलियारों तक पहुंचने में मदद करेगी।
वहीं जनता भी इस उम्मीद में वोट देती है कि उनके जीवन में सुधार हो जाएगा। चंद नेताओं की उम्मीदें टूटी हैं मगर आजादी के बाद यदि किसी चीज की गारंटी रही है तो वह है जनता की उम्मीदों के टूटने की गारंटी। वैसे उम्मीदवारों की जनता जनता से जितनी उम्मीद रहती है उससे कई गुना ज्यादा उम्मीद उन्हें पहले तो अपनी पार्टी से रहती है कि कम से कम उनकी पार्टी उनके उम्मीदों को नहीं तोड़ेगी और उन्हें टिकट देगी।
वैसे ये खेल तो चुनाव से पहले चलता ही रहता है और इन दिनों बिहार में यह अपने चरम पर है। हालांकि बिहार का ये खेल इस बार कुछ फीका रह जाएगा। क्योंकि राजनीति के मौसम का सभी जायजा लगाने वाले और राजनीति की गलियों में मौसम वैज्ञानिक कहलाने वाले रामविलास पासवान जी हम अब हमारे बीच नहीं हैं।
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें और वाकई उनकी गैर मौजूदगी ने बिहार की राजनीति में एक ऐसा शून्य पैदा कर दिया जिसे कभी कोई नहीं भर पाएगा। वहीं एक शून्य जनता दल यूनाइटेड में भी होता हुआ दिखाई दे रहा है। सुनने में ये भी आ रहा है कि जनता दल यूनाइटेड के कुछ नेताओं ने टिकट ना मिलने के बाद नीतीश कुमार को अभिशाप तक दे दिया।
वैसे राष्ट्रीय दल के नेता कह रहे हैं कि नीतीश को हारने के लिए उनके 15 वर्ष का शासन काफी है। उन्हें किसी अभिशाप की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। सुना है बड़े सिर फुटौव्वल के बाद जब सीटों का बंटवारा हुआ तो भाजपा और जनता दल यूनाइटेड दोनों के काफी नेता नाराज हो गए।
कुछ भाजपा के नेता तो इसलिए नाराज हो गए कि उन्होंने अपने क्षेत्र में इतना काम किया था कि जीत निश्चित थी पर सीट, जनता दल यूनाइटेड के खेमे चली गई। जबकि वहां की जनता बता रही है कि अच्छा हुआ जो भाजपा यहां से चुनाव नहीं लड़ रही वरना ईवीएम में कमल देखते ही उस पर कीचड़ फेंक देते। पार्टी के कुछ नेता इतने नाराज हुए कि भाजपा के कार्यालय के बाहर लगातार विभिन्न नेताओं के मुर्दाबाद के नारे लग रहे हैं।
ये चुनाव है..असली ताकत तो जनता के हाथ में है
अब रघुवंश बाबू के निधन के बाद उनके बेटे जदयू में आ गए हैं। असल में रघुवंश बाबू नाराज थे कि राष्ट्रीय जनता दल कुछ बाहुबलियों को टिकट दे रहा था। इस पर तेज प्रताप के समर्थकों ने कहा कि जब जनता ने बाहुबली का टिकट खरीदा तो किसी ने आवाज नहीं उठाई... हमने बाहुबलियों को टिकट दे दिया तो लोग विरोध कर रहे हैं। वैसे राष्ट्रीय जनता दल बाहुबलियों को अपना वोटर मानती रही है।
मगर बाहुबली अपना बल तभी दिखा पाते हैं जब वो चुन जाते हैं और ये चुनाव का मौसम है। इस वक्त जनता असली बाहुबली होती है। जिसे चाहे उठाकर फेंक दे। अब देखने वाली बात ये होगी कि इस बार जनता किसी विधान भवन से बाहर फेंकती है और किसे विधान भवन के अंदर वाली सर्वोच्च कुर्सी की ओर फेंकती है।
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Source From
RACHNA SAROVAR
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