निदा फाजली की मशहूर गजल है
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना है कई बार देखिए।
लेकिन जब बात राजनीति की हो तो यहां 10-20 चेहरों से भी काम नहीं चलता। नेताओं को परखने में दो चार महीने क्या, कई साल भी कम पड़ जाते हैं। और जब बात नेता बनाम नेता की हो तो भी आपस की परख का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजग से लोजपा के अलग होने की बात पर दो दिन पहले तक किसी को यकीन नहीं था।
एक हफ्ते पहले तक तो भाजपा-जदयू दोनों के दिग्गज प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही स्तर पर ये कहते सुने जा सकते थे कि आखिर लोजपा जाएगी कहां? सीटें बढ़वाने के नखरे हैं। दो-चार सीटें हो सकता है और बढ़ जाएंगी। 2 अक्टूबर को लोजपा की तरफ से बयान आया कि सात निश्चय की जांच करवाई जाएगी, दोषी पर कार्रवाई होगी। इस बयान में आगामी चुनाव में लोजपा का क्या रुख क्या होगा? स्पष्ट था।
दैनिक भास्कर ने स्पष्ट लिखा भी-लोजपा-जदयू साथ की गुंजाइश खत्म। इस पर एक बड़े वर्ग की आपत्ति आई। आरोप भी कि आप चुनाव प्रभावित करना चाहते हैं। खैर...लोजपा का स्पष्ट फैसला और रुख सामने है। अब कुछ लोग दुहाई दे रहे हैं कि ये गठबंधन धर्म के विपरीत है। संभव है कि वे सही हों? क्योंकि गठबंधन धर्म की स्पष्ट परिभाषा कहीं मुझे मिली नहीं, लेकिन चुनावी इतिहास में तो ऐसे कई अध्याय हैं जब केंद्र में गठबंधन रहता है और राज्य में नहीं या एक राज्य में रहता है और दूसरे राज्य में नहीं।
इसलिए एक नजर से देखें तो चिराग ने चुनावी गठबंधन की इसी परिपाटी का निवर्हन किया है। इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा के दोनों हाथों में लड्डू है। लोजपा की सीट और वोट दोनों ही उसके खाते दिखाई दे रहे हैं। क्योंकि चिराग ने स्पष्ट किया कि वे जदयू से अलग हुए, भाजपा से नहीं। और वह पहले से ही अपने वोटरों को भाजपा के साथ का संदेश लगातार देते रहे हैं। रिजल्ट के बाद भी भाजपा को जदयू और लोजपा दोनों का ही समर्थन रहेगा।
रही बात जदयू की तो वोट बैंक में पहले से ही उपेन्द्र कुशवाहा के मोर्चे से कोयरी वोट का थोड़ा नुकसान हो रहा था, अब लोजपा के भी अलग होने से पासवान वोट पर भी निश्चित रूप से असर पड़ेगा। माना जाता है कि लोजपा जहां जाती है, उसका वोट उसके साथ चला जाता है। सीएसडीएस-लोकनीति का सर्वे इसे प्रमाणित करता है। 2010 में लोजपा, राजद के साथ थी तो 57% पासवान वोट गठबंधन को मिला। 2015 में भाजपा के साथ आई तो 51% पासवान वोट एनडीए के साथ हो गया।
नीतीश कुमार इस खतरे से वाकिफ भी थे। तभी वह 'हम' को अपने साथ ले आए। फिर अशोक चौधरी को बिहार जदयू का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया। ऐसे उन्होंने एक दलित जाति से हो रहे नुकसान को दो दलित जातियों से पूरा करने की कोशिश की। लेकिन लोजपा का अलग होना चुनाव से पहले के गणित से ज्यादा बाद के गणित में नुकसानदायक है।
ऐसे में चुनावी गणितज्ञ माने जाने वाले नीतीश कुमार क्या फाॅर्मूला निकालेंगे..ये देखना बाकी है। जहां तक बिहार के चुनावी गणित की बात रही तो उसमें अब भी भाजपा-जदयू गठबंधन का पलड़ा तो भारी ही है...लेकिन यहां तो बात सिर्फ राजग के अंदर के गणित की है।
सतीश सिंह, संपादक, बिहार
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Source From
RACHNA SAROVAR
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