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दाल की खेती के साथ अपराध के लिए भी उर्वर जमीन, कोई किसी पार्टी से मैदान में उतरे, मुकाबला तो ‘छोटे सरकार’ से ही

(राकेश रंजन) मोकामा के टाल क्षेत्र को दाल का कटोरा माना जाता है। दाल की खेती के लिए टाल की मिट्टी जितनी उपजाऊ है, किसी समय में यह मिट्टी अपराध के लिए भी उतनी उर्वर थी। टाल के किसान आजीविका के लिए दलहन की खेती पर निर्भर थे। वहीं इस फसल को बचाने के लिए मुख्यधारा से भटके युवा बंदूक संस्कृति की ओर मुखातिब थे। टाल से लेकर सड़क किनारे बसे गांवों मोहल्लों में जब इन्हीं अपराधियों के बीच जब गैंगवार की शुरुआत हुई, तो वहीं से बाहुबल का जन्म हुआ। धीरे-धीरे इस पर अंकुश भी लगा और बाहुबलियों ने अपना राजनीतिकरण कर लिया। इस बार भी मोकामा विधानसभा क्षेत्र तीन बाहुबलियों के बीच अखाड़ा बनने को तैयार है।
निवर्तमान निर्दलीय बाहुबली विधायक अनंत सिंह ने तो राजद के टिकट पर चुनाव लड़ने की घोषणा तक कर दी है। हालांकि, राजद की ओर से अभी इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। अभी अनंत सिंह जेल में हैं। पिछले साल तीसरे नंबर पर रहे जाप प्रत्याशी ललन सिंह जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं, हालांकि अभी इसकी गारंटी नहीं है।

पूर्व सांसद सूरजभान सिंह के मंझले भाई कन्हैया सिंह इस बात पर अड़े हैं कि यह सीट किसी हालत में लोजपा से जदयू के पाले में न जाए। पिछले चुनाव में कन्हैया लोजपा से चुनाव लड़े थे और चौथे नंबर पर रहे थे। दूसरे नंबर पर रहे पूर्व मंत्री नीरज कुमार ने इस पर मोकामा से मुंह मोड़ लिया है और स्नातक कोटे से विधान परिषद जाने की तैयारी में हैं।

हालांकि, मोकामा विधानसभा क्षेत्र जदयू के खाते में जाएगा या लोजपा के पाले में रहेगा, यह फैसला अबतक नहीं हुआ। राजद ने भी अभी यह क्लियर नहीं किया है कि वहां से किसी प्रत्याशी को मैदान में उतारेंगे या अपने एलायंस को यह सीट देंगे। लेकिन, यह तय है कि निवर्तमान विधायक अनंत सिंह किसी सीट से टिकट नहीं मिलने पर भी निर्दलीय मैदान में उतरेंगे।

पिछली बार भी वे बिना किसी पार्टी सिंबल के विधानसभा पहुंचे थे। शिवनार में कुछ बुजुर्ग साथ बैठे हैं। चुनावी रंग में रंगे इन बुजुर्गों को अभी से आधा रिजल्ट पता है। दिलीप सिंह और त्रिवेणी सिंह कहते हैं, कोई भी किसी पार्टी से मैदान में उतरे, टक्कर तो छोटे सरकार (अनंत सिंह) से ही होगी।

नहीं बनी सड़क, अब नोटा दबाने की तैयारी
मोकामा शहर से कुछ ही दूरी पर है घोसवरी प्रखंड का गोसाईं गांव। श्रीकांत कुमार कहते-गांव में अबतक सड़क नहीं बनी। न तो पुलिस की पैट्रोलिंग होती है, न ही कभी हेल्थ कैंप लगता है। लोगों की सुरक्षा भी भगवान भरोसे है। रंजीत यादव कहते हैं-इसबार नोटा दबाने की तैयारी है।
सबसे अधिक भूमिहार वोटर, उसके बाद धानुक-यादव

इस विधानसभा क्षेत्र में करीब 70 हजार भूमिहार वोटर हैं। वहीं 40 हजार धानुक और 30 हजार यादव। शेष में कुर्मी और पासवान प्रमुख हैं। जाति के आधार पर यहां शुरू से भूमिहार उम्मीदवारों की बहुलता रही है। 1951 से अबतक हुए विधानसभा चुनावों में सिर्फ एकबार दूसरी जाति के उम्मीदवार को यहां से जीत मिली। इसबार भी तीनों प्रमुख दावेदार भूमिहार हैं।

सीट का इतिहास: मोकामा विधानसभा क्षेत्र 1951 में अस्तित्व में आया। 1951 व 1957 में कांग्रेस के जगदीश नारायण सिंह ने जीत दर्ज की थी। 1962 में निर्दलीय सरयू नंदन प्रसाद सिंह, 1967 में रिपब्लिक पार्टी ऑफ इंडिया के बी. लाल, 1969 में कांग्रेस के कामेश्वर प्रसाद, 1972 व 1977 में कांग्रेस की कृष्णा शाही, 1980 व 1985 में कांग्रेस के श्याम सुंदर सिंह और 1990 और 1995 में जनता दल के दिलीप कुमार सिंह जीते थे। ये अनंत सिंह के बड़े भाई थे। 2000 में निर्दलीय सूरज सिंह उर्फ सूरजभान सिंह, 2005 व 2010 में अनंत सिंह जदयू के टिकट पर और 2015 में निर्दलीय जीते थे।



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मोकामा शहर से कुछ ही दूरी पर है घोसवरी प्रखंड का गोसाईं गांव, ग्रामीण बताते हैं कि यहां अबतक सड़क नहीं बनी है।


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RACHNA SAROVAR
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