(भैरव लाल दास) कल गांधी जयंती है। बिहार में विधानसभा चुनावों के कारण ‘महात्मा’ का महात्म्य प्रासंगिक होना लाजमी भी है। हालांकि गांधी कोई भी चुनाव कभी नहीं लड़े। 1929 ई. में लाहौर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में अध्यक्ष पद के लिए सर्वाधिक मत गांधीजी के लिए दिया गया। लेकिन गांधीजी ने अपने बदले जवाहरलाल नेहरू को अध्यक्ष पद के लिए नामित कर दिया।
हालांकि, गांधी ने हमेशा चुनाव की वकालत करते रहे। चुनावों में महात्मा की प्रासंगिकता हमेशा से रही है। उम्मीदवारों को पहले भी और आज भी लगता है कि उम्मीदवारों को ऐसा लगता है कि यदि वे चुनावी सभा में गांधीजी का नाम लेंगे तो मतदाता उन्हें भी चरित्रवान और साफ-सुथरा मान लेंगे। इसे लेकर सबसे दिलचस्प किस्सा उड़ीसा का है।
1948 ई. में महात्मा गांधी की मृत्यु हुई और 1952 ई. में आम चुनाव हुए। उड़ीसा का एक कांग्रेस उम्मीदवार अपने चुनाव प्रचार के दौरान गांधी की खूब चर्चा करता और चर्चा करते-करते अंत में भावनात्मक रूप से कहता कि गांधी की आत्मा बैलेट बॉक्स में बैठी हुई है। वह यह देखेगी कि कौन-कौन मतदाता उन्हें आदर देना चाहता है।
मतदाता अपना मतपत्र लेकर बैलेट बॉक्स के सामने झुककर प्रणाम करते थे मानो वे गांधी की आत्मा को प्रणाम कर रहे हैं और अपना मतपत्र कांग्रेस के बैलेट बॉक्स में डालकर फिर से प्रणाम कर बाहर निकल जाते। कांग्रेसी उम्मीदवार भारी मतों से विजयी हुए। आज भी कुछ ऐसी ही स्थिति-परिस्थिति बना दी गई है कि हर दल एक बड़े चेहरे के साए में बहुमत हासिल करना चाहती है। 1920 ई. के हुए आम चुनाव का गांधी ने बहिष्कार किया था।
प्रांतीय शासन के स्वरूप पर प्रतिवेदन के लिए 1918 ई. में ही भारत सचिव एडविन सैम्युएल मांटेग्यु और वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड की समिति बनी। 1919 ई. में बैसाखी के दिन हुए जालियॉंवाला नरसंहार के बाद पूरे देश में सरकार के खिलाफ असंतोष की लहर दौड़ गई। 1920 ई. में इमपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल के 104 निर्वाचित सदस्यों में से 66 सीटों के लिए चुनाव होना था।
बाकी 38 सीटें यूरोपियन के लिए सुरक्षित थी। राज्य सभा की 34 सीटों में 24 के लिए चुनाव होना था और शेष 5 मुसलमान, 3 अश्वेत, 1 सिख और 1 संयुक्त प्रान्त के लिए सुरक्षित थे। 9 फरवरी, 1921 को ड्युक ऑफ कनाट द्वारा संसद के सत्र की शुरूआत की जानेवाली थी। इस चुनावी राजनीति में ब्रिटिश सरकार ने गांधी को मात दे दिया था।
गांधी जी का कहना था...हर वयस्क को वोट देकर अपना प्रतिनिधि चुनने का मौका दिया जाए
गांधीजी ने कई अवसरों पर कहा कि इस भू-भाग में रहनेवाले सभी वयस्क को वोट देकर प्रतिनिधि चुनकर सरकार बनाने में भागीदारी का मौका दिया जाना चाहिए। इस देश के हर वयस्क को वोट का हक मिलना चाहिए। गांधी के सुझाव पर कांग्रेस ने इसे अपने संघर्ष के बिन्दुओं में शामिल कर लिया। 1929-30 ई. में हुए राज्य विधान मंडल के चुनाव में पहली बार ऐसी महिलाओं को मताधिकार मिला जिनके पास संपत्ति हो। यह अधिकार भी प्रतीकात्मक ही साबित हुआ क्योंकि इस निर्णय के बाद भी अधिकांश महिलाएं मतदाता सूची के बाहर ही रह गई। चुनावी राजनीति पर गांधी के प्रभाव का दूसरा दौर 1930 के बाद आरंभ होता है।
...और जब खास लोगों को ही मतदान का अधिकार मिला
भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत आम निर्वाचन हुए। इसमें भी खास लोगों को ही मत देने का अधिकार दिया गया। कांग्रेस ने इस अधिनियम का विरोध किया। वह देश में आजादी चाहती थी। तथापि कांग्रेस ने आम चुनाव में भाग लिया और 11 में से 6 राज्यों में विजयी भी हुई। 16 मार्च को कांग्रेस ने निर्णय लिया कि वह इस शर्त्त पर सरकार बनाएगी कि राज्यपाल अपने ‘वीटो’ की शक्ति का दुरुपयोग सरकार के खिलाफ नहीं करें।
पहले चुनाव से लेकर आज भी चुनाव में भ्रष्टाचार कायम है
1952 ई. में हुए प्रथम आम चुनाव में भी प्रक्रिया को प्रभावित करने के प्रयास हुए थे। उस समय चुनाव बूथ पर हर राजनीतिक दलों के लिए अलग-अलग बैलेट बॉक्स रखे जाते थे जिस पर उम्मीदवार का चुनाव चिन्ह का पोस्टर साट दिया जाता था ताकि अनपढ़ मतदाता भी समझ कर मतदान करें। अमूमन बैलेट बॉक्स वाले स्थान या कमरा में किसी भी कर्मचारी को नहीं रहने दिया जाता था ताकि मत की गोपनीयता बनी रहे।
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Source From
RACHNA SAROVAR
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